क्या थे वो दिन जो आज गुजर गए



ख़्वाबों में जिया
मैने
संग तुम्हारे पिया
तुम्हें ख़्वाबों में ही देखा
जब भी
लांघ के लक्ष्मण रेखा
तेरी बाहों का प्रेमपाश
वहीं तो थी
मेरी जन्नत- ए-तलाश

निद्रा का ख़्वाब होता
तो टूटने का दर्द ना होता
खुली आँखों के
सूनेपन में देखे
अधूरे से तेरे ख़्वाब
गुस्ताख़ दिल की
नादानियां कह गए
अश्कों के सैलाब में
तैरते ख़्वाब आँखों में
आर्द्र बह गए
दर्द से व्यथित
गुमसुम रह गए

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