देव दासी भाग 507

जब उसने भैया को ये कहते सुना तो वो शर्मा कर अपने कमरे की ओर चल पडी

आज उसे ये दुनिया नई नई लग रही थी

उसे लगता था कि चारो तरफ सुगंध ही सुगंध फैली हुई है

उसे तो बस वीर सिंह का चेहरा ही हर तरफ दिखाई दे रहा था

वो खुशी के मारे झूम उठी थी कि उसकी प्रभु ने पुकार सुन ली नहीं तो वो किसी और के साथ अपना जीवन गुजारने की सोंच नहीं सकती थी

वो खुशी के मारे शीशे की तरफ अपने आप को देखने लगती उसकी सोलह साल की उम्र

आज वो कितनी खूबसूरत लग रही थी

उसने अपने लंबे बाल खोल लिए

आज वो अपना रूप निहार रही थी

काली घटा के समान ये लंबे बाल वीर सिंह को अपनी छाँव तले विश्राम देने को व्याकुल थे

उसका पूरा शरीर आज बेसुध हो रहा था

क्रमशः

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