अनुकूल हो गए हम


धूप के आदी हो गये, छाया हमें भरमाती नहीं कितने अनुकूल हो गए हम
सुख की बेला खो गयी,चाँदनी घर आती नहीं
अँधेरे रास आने लगे,अमावस अब डराती नहीं,
खुले जख्म हँसते है,किस्से कहानी बनाती नहीं कितने अनुकूल हो गए हम

भरी बारिश पत्ते पीले लगे,हरियाली भाती नहीं,
लम्हातों ने देखा मुझे,यादें अब मिलने आती नहीं।
बदली जमाने की राह,मोड़ पर नज़र जाती नहीं,
खोए खुद में इस कदर,सूरतें हमें याद आती नहीं।कितने अनुकूल हो गए हम

✍️✍️

टिप्पणी करे

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें