दूषित मन


हवस की भूख अन्धी है,
वो दिया जलाना क्या जाने,
जिनके दिलों में आग भरी,
वो सूरज को क्यों पहचाने।
सोच जिनकी दूषित है,
वो भूल गये सब याराना,
जिनके मन भाव नहीं,
वो भगवान को क्या जाने।

टिप्पणी करे

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें