कर्मों के ये खोटे बन्दे, झूँठे हैं इनके सब धन्धे।
हर चाल है इनकी फरेबी,बातों का रस सरस जलेबी।१
मक्कारी की इनकी बातें, झूँठे सबसे इनके नाते।
मतलब पे बस ये हैं मरते,अपनों को ही मिलके छलते।।२
बिन रंगों के इनकी होली, कोरी रिश्तों की रंगोली।
छुपके मनाते हैं ये खुशियाँ,खुद दिखाते बड़े हैं दुखिया।।३
सन्तों जैसी इनकी बातें,काले काले हैं इनके खाते।
छुपके खाते भर-भर थाली,अपनो को देते हैं गाली।।४
चरित्र है इनका बड़ा मैला,जीवन इनका बना कुचैला।
बाहर से करते रंगाई, भीतर टूटी है चरपाई।।५
सूट बूट गल सोहे टाई,दरपन में देखि देखि मुस्काई।
देख देख के हंसी आई, मरते हैं ये खुद पर भाई।।६
अपने में ये ऐसे डूबे, जैसे कूएँ के मंडूके।
दुनियाँ है इनकी बस छोटी,नियत इनकी बड़ी है खोटी।।७
मार के हक रहते हैं जिन्दा,घायल इनसे हुआ परिंदा।
अपनो संग करी गद्दारी,भूल गये सब नातेदारी।।८
सच्ची बाते इनको चुभती,झूँठों से इनकी खुब बनती।
सपने इनके सारे पूरे, फिर भी है अधूरे अधूरे।।९
खुद खेले खुद बने खिलाड़ी,खुद नाचै बजाय के ताली।
अपने मन के ये हैं राजा, मतलब का बजता है
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