प्रेम ही आनंद का मूल है,,
प्रेम ही सृष्टि का सार है प्रेम ही पूजा है
प्रेम ही विश्वास है प्रेम सरस है
निर्मल है भावात्मक है
सकल सृष्टि की उत्पत्ति प्रेम से ही संभव हो सकी है
परंतु समझने की बात यह है
कि आखिर प्रेम है
क्या सभी प्रेम की उपमा देते हैं
प्रेम की बात करते हैं
परंतु प्रेम वास्तविक रूप से अध्यात्मिक है
जो शरीर के आकर्षण से ऊपर उठकर आत्मा से होता है
और आत्मा परमात्मा का अंश है
इसलिए प्रेमा ऐसा हो
जिसमें आत्मा को परमात्मा से मिलन हो
उन्हीं का दर्शन हो
उन्हीं के साथ में संगम हो
यह प्रेम की पराकाष्ठा है
इसलिए समस्त इंद्रियों पर विजय प्राप्त करके
एक गोविंद से प्रेम करें
और अपने जीवन को धन्य धन्य सफल बनाएं
सकल 8400000 योनियों को जितने भी जीव
भ्रमण कर रहे हैं
जलचर नभचर पृथ्वी पर रेंगने वाले
किसी के साथ भी अन्याय पूर्ण से उनके साथ दुराचार ना करें
सभी को प्रेम से जीने का मार्गदर्शन करें
और सकल सृष्टि को सभी में भगवान का स्वरूप
आत्मा रूप से देखें
गोविंद का अंश मानकर सभी से प्रेम करें
आनंदित रहें योग के द्वारा अपनी समस्त मन बुद्धि चित्त इंद्रियों को अपने बस में रखें
पूर्ण आनंद से जीवन बताएं यह जीवन का रहस्य है
जो शांति को प्रदान करने वाला है
इसलिए शांति अपने अंदर हो तो
फिर संसार सुंदर दिखाई देता है
और अपने अंदर शांति ना हो तो
यही संसार जो है कष्टकारी दिखाई देता है
जैसा आपकी अंतरात्मा में चल रहा है
वैसे ही यह दुनिया आपको दिखाई देगी
इसलिए अपने को सुंदर बनाएं
अपने विचारों को सुंदर बनाएं
और सभी के साथ में श्रद्धा भावना के साथ जोड़ करके गोविंद का ध्यान करते अपनी जिंदगी का पालन
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