रोज हमें खाने को मिलता है ये मेरी किस्मत है जो हमारे पेट मे भोजन है, किसी किसी को तो तरसना पड़ता है एक एक रोटी के लिए
आँखों मे तूफान है, पेट मे भूख की आग लिए, बस पेट की आग बुझाने के लिए किस तरह क्या क्या करना पड़ता है
कभी कभी पेट की खातिर सच्चे को भी झूठ बोलना पड़ता है
जब पेट मे भूख की आग लगती है तो ये दुनिया और ये सामाज कुछ भी दिखाई नहीं देता भूख के आगे कोई भी दुख नहीं है
जितना खाना हो उतना ही लो अपना पेट भरो और दूसरों को भी खाने दो
भोजन फेंक कर क्या दिखाते हो किसी भूखे और बेबस की पेट की आग बुझाने के लिए कुछ कार्य तो करो
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