कुर्बानी जानवरों की हत्या मानते हैं लेकिन बलि भी तो बेजुबान की हत्या ही है

मैं हिन्दू हू हमारे समाज में कुर्बानी, बलि की इजाजत नहीं है

लेकिन मैं हिन्दू हू मैं किसी भी रीति रिवाजों की निंदा नहीं करती

मैंने इसे अपने नजरिए से देखा है

किसी भी जानवर की कुर्बानी होती है उसमे उसी दिन अल्लाह का नूर आता है उस जानवर पर

कुछ पिछले जन्म का भी उस जानवर का लोगों का लेखा जोखा होता है

आज के दिन जब नमाज पढ़ी जाती है तो उस जानवर मे एक विचित्र सी शक्ति आ जाती है

वो उस समय कुछ अचेत सा हो जाता है

अल्लाह कोई शरीर नहीं हैं वो एक नूर है जो उस जानवर मे आने लगता है वो भी अल्लाह का ही होने लगता है

उसे याद आने लगता है कि जिसके हाथो से कुर्बान होना है उसका और मेरा एक रिश्ता है

जो आज उसे इस जालिम दुनिया से मुक्त करेगा

जब तक उसके वो नूर नहीं आता तब तक उसे दुख तकलीफ होती है परंतु जब नमाज अदा हो जाती है तो उस पर अल्लाह का एक खूबसूरत नूर आखों के सामने आ जाता है और वो उस नूर को देखकर खुश होता है कि आज आपके ऊपर मुझे कुर्बान होना है और मेरा शरीर तो अब तुम्हारा है

जब गर्दन पर चाकू चलती है तो उसे दर्द नहीं होता और वही नूर उसके दर्द को कम करता है और खून निकलने के बाद उस जानवर की रूह उस नूर मे समा जाती है और फिर सबका लेनादेना भी समाप्त हो जाता है

मुझे माफ़ करना आप लोग,,,,,

“कुर्बानी जानवरों की हत्या मानते हैं लेकिन बलि भी तो बेजुबान की हत्या ही है” को एक उत्तर

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