थिरकते हुए क्या अच्छे लगते हैं उसके घुँघरू

साहब वेश्यालय मे कभी गौर किया है किस तरह छोटी छोटी लड़कियां मनोरंजन करती है ग्राहकों का

उनकी भी आंख में ज़ज्बात होते हैं

लेकिन कुछ किस्से भी होते है उनका अतीत भी होता है राही आते हैं और उन्हें राह मे छोड़ कर गुम हो जाते हैं

क्या वे किसी से प्यार नहीं करती हैं

करती हैं कुछ आते हैं प्यार दिखाते है और अपने साथ ले गाते हुए ले जाते है नशे की धुन में

आओ चले कुछ ऐसे चलें कि लोग ना समझे ना लोग देखे कोई देखे तो क्या कहेगा इसका कोई डर ही नहीं

लेकिन उसे मालूम है कि वहां पर क्या होगा पहले तो घुँघरू कि थाप होगी बाद ने दारु का चलेगा सिलसिला बाद मे होगा प्यार का नाटक जो उसने कितनी बार देखा कितनी बार झेला

और फिर होगी वहीँ गलियों की बाजारों की दहलीज और नुमाइश का अंधेरा कारवाँ

लेकिन उसे क्या मालूम था कि इस बार एक देवता जो दिखता था लेकिन अब उसने नशे की झोंक मे अपने घर मे ही उसकी बोली लगा दी

दिया बाती बुझा दी

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