एक दुल्हन की बारात

दुल्हन की जब बारात आती है तब स्वप्नों मे खो जाती है वो दुल्हन अपने पति की कल्पना मे

शर्माती है लजाती है और अपने दूल्हे के आने का इंतजार करती है बार बार घड़ी देखती है और अपनी सखियों से पूछती है आंख के इशारे से

तभी जोर से अवाज आती है बारात आ रही है, बारात आ रही है, दुल्हन को जल्दी तैयार करो, जयमाला के लिए

दुल्हन भी अपनी बारात को देखने के लिए उत्सुक होती है पर शर्म के मारे अपनी ही बारात को देख नहीं पाती और वो चुपके से बारात देखने की कोशिश करती है लेकिन कोई कह देता है कि चलो जल्दी से जल्दी ठीक कर लो अपने आप को

आते ही जयमाला पड़ेगी

अब दुल्हन अपने दूल्हे को देखना चाहती है उसके मन मे बैचैनी हो रही है घबरा रही है और सोंच रही है कि जल्दी ही उनको देखने की तमन्ना के साथ जयमाला हाथ मे ले लेती है साथ मे उसकी सहेलियाँ होती है

ज्योंही वो उनके पास जाती है उसकी घबरा हट ठीक हो जाती है और जब वो एक नजर अपने दूल्हे को देख कर ठंडी आह भर्ती है कि चलो दूल्हा भागा नहीं सही सलामत आ गया घोड़ी उसके दूल्हे को खेत मे लेकर नहीं भागी

“एक दुल्हन की बारात” को एक उत्तर

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