

ये मेरी गुरु दीदी है
आज मुझे अपने बचपन का एक संस्मरण याद आया अपने गुरु का
मैं स्कूल मे पढ़ती थी हमारी मिस जिनका नाम पुष्पा था वे फ़ूलों की तरह हंसती थी हमें पढ़ाती थी गुस्सा हो जाती थीं तो हाथ ऊपर करके खड़ा कर देती थी और लड़कों को मुर्गा बना देती थी
अब लड़के मुर्गा बन जाते थे और हम लोग हाथ ऊपर करके खड़े हो जाते तो लड़के पैरों के नीचे से मुह निकाल कर अपनी जीभ दिखा कर हम ल़डकियों को चिढ़ाते थे
जहाँ मिस आती तो बगुले बन जाते
हमलोग क्या करें हमारे हाथ ऊपर थे नहीं हम लोग उन लोगों को दो तीन मुक्के रसीद कर देते
लेकिन मजबूरी थी
मैं रोने लगी मुझसे सहन नहीं हो रहा था कि वे लड़के हम लोगों को मुह चिढ़ा रहे थे
एक लड़की भी बहुत गुस्से से मुह फूला रही थी और अपने होंठ दांत से काट रही थी और भी 5 लड़कियां थी जो आगबबूला हो रही थी
अब उसने उन लोगों को सबक सिखाने के बारे मे सोंच ही लिया था उसने उन लड़कों के बगल मे खिसकी और जब मिस किसी काम से चली गई तो उसने अपना हाथ नीचे कर लिया और एक जोर का थप्पड़ उस लड़के के पिछवाड़े मे मार दिया
और जोर से चुटकी काट ली अब वो तिलमिला गया
अब लड़की मार काट करके अपनी जगह वापस आ गई
अब हम लोग भी यही करने लगे जब मिस चली जाती तो हम लोग मार काट कर अपनी जगह वापस आ जाते
एक लड़का रोने लगा
उसके आंसू निकलकर चु रहे थे लेकिन वो कुछ कर नहीं पाया
अब उन लोगों ने कुछ देर बाद हम लोगों को चिढ़ाना छोड़ दिया
पुष्पा मिस ने ही सिखाया था कि सहन उतना ही करो जितना सहन कर सके
आज उन्हीं पुष्पा मिस ने हमे सहना भी सिखाया और हमे रहना भी सिखाया कि सामाज और परिवारजनों के साथ किस प्रकार रहना चाहिए
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