एक खण्डहर

एक खण्डहर जो अब अकेला हो चुका ये भी किसी का सहारा था इसमें ना जाने कितने लोग रहते थे, हंसते थे
खुशिया ही खुशिया थी छोटे छोटे बच्चे रोते, हँसते और लड़ते झगड़ते थे
ये खण्डहर तब जवां था
इसका भी एक रुतबा था रंग बिरंगे चित्रों से ये सजा हुआ था
इसकी छत पर कितनी पार्टियां होती थी लोगों की भीड़ थी
महिलाओं की हंसी दूर दूर तक सुनाई देती थी
कुछ समय बाद इसका भी समय बदला
बच्चे बड़े हो गए पढ़ने चले गए
बुजुर्गों के कफन ओढ़कर जाने का ये घर छोड़ने का समय आ गया था
विधवाओं का रोना भी इसी घर ने सुना
बुजुर्गों का दम तोड़ना अपने बच्चों को देखने की लालसा लिए इसी घर ने देखा
बच्चे बड़े हो गए जवां हो गए अपने सपने पूरे करने के लिए ये घर छोड़ कर जाने लगे
महिलाये भी चली गई
इस घर मे केवल एक महिला ही रह गई जिसके कोई संतान नहीं थी पति का देहावसान हो चुका था
वो ही बची थी एक दिया जलाने के लिए
घर का प्लास्टर, चित्रकारी अब निकलने लगी मरम्मत कौन कराता किसी के पास फुर्सत ही नहीं
कुछ दिन बाद वो रोशनी देने वाली महिला भी चल बसी
ताला लगा दिया लोगों ने
अब तो इस घर मे दरवाजे भी पुराने हो चुके उसमे भी दीमकों का बसेरा हो गया
धीरे धीरे सारा घर टूटने लगा और एक दिन खण्डहर हो गया
आज वह घर प्रतीक्षा करता हुआ प्रतीत होता है कि काश कोई आए और वही समय वापस आए
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