पतंग की तरह

किसी किसी की जिंदगी ही नहीं सबकी जिंदगी पतंग की तरह होती है बस एक साँस रूपी डोर जब तक बची है तब तक पतंग उठती रहेगी कभी नीचे गिर जाती है कभी कुछ ऊपर, कभी एकदम ऊपर, जब एकदम ऊपर जाती है तो पतंग को गुरूर हो जाता है अपनी ऊंचाइयों का और वो और पतंगों को काटने की कोशिश करती हैं परंतु हर समय तो उसके ताकत नहीं होती एक बार नीचे आती है हवा का एक झोंका आता है पतंग कमजोर हो जाती है और कोई उस पतंग को काट देता है पतंग निर्जीव होकर धरती या किसी पेंड पर लटक जाती है फ़ट जाती है लूटी जाती है

उसी प्रकार हमारा जीवन भी है

“पतंग की तरह” को एक उत्तर

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