
दिव्य मृत्यु हर किसी की नहीं होती
ये मृत्यु उसकी होती है जिसने संसार के रसों का स्वाद लिया पर उनमे भटका नहीं और ना हो भौतिक वस्तुओं मे उसकी आसक्ति हुई
उसे जो मिला उसने अपनी मेहनत करके पाया
वो भीड़ से दूर रहा उसने जो किसी के लिए किया सबकुछ भूल गया किसी ने उसके लिए किया उसने उसका शुक्रिया किया
उसने सबका सम्मान किया अभिमान से दूर रहा, संसार के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा करता रहा
जिस धर्म मे जन्म लिया जिस देश की मिट्टी मे जन्मा उसके प्रति ईमानदार रहा
जिसमें सेवा भाव था उसमे सबकी सेवा की द्वेष भाव से दूर रहा जिसने उसके साथ गलत किया सबको माफ़ किया
जो सामने आया उसको अपनाया और जिसमें उसे दोष दिखा उससे दूर रहा
भोजन किया साधारण किया किसी को मारकर नहीं उसने अपना पेट भरा
सत्य पर कायम रहा हर स्थिति से अनुकूल किया
आध्यात्मिक भाव को जाग्रत किया ईश्वर का दास रहा उसने जान लिया संसार के रहस्यों को पहचान लिया उसके अस्तित्व को ज्ञान के साथ चलता रहा
आज जब उसकी मृत्यु उसके सामने आई तो उसने मुस्कुराते हुए अपनी मृत्य का हाथ जोड़कर स्वागत किया और एक सुन्दर सी आभा अपने चेहरे पर मुस्कान भरकर इस दुनिया से विदा हो गया
और अब वो आजाद होकर मस्त होकर विचरण कर रहा है जन्म मरण के बंधनों से मुक्त हो गया
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