मैं अपनी गर्मी की छुट्टियां मनाने के लिए गाँव जाया करती थी

मन मे एक हलचल होने लगती थी जब हमारी गर्मी की छुट्टियां शुरू होती थी हम लोग गाँव जाने के बारे मे सोंचते थे हम सब एक साथ गाँव जाते थे

वहाँ पर चाचा के बच्चे भी होते थे वे लोग हमारा इंतजार करते थे मेरे पापा और चाचा हम लोगों को गाँव ले जाते थे

हम लोग एक रिक्शे मे बैठकर पहले गाँव जाते थे बहुत मज़ा आता था बाद मे हम लोग ट्रेन मे बैठकर गाँव जाते थे

ट्रेन हरे हरे पेड़ों से होकर गुज़रती थी ठंडी हवा का मजा लेते थे सब लोग

पैसे की कमी होती थी मम्मी हम लोगों को पुड़िया और आलू की सब्जी बांध देती थी एक कपड़े मे

लेकिन समोसा देखकर हम लोगों का मन ललचाया करता था

लेकिन चाचा हम लोगों को एक एक समोसा दिलवा देते थे

सुराही मे पानी लाते थे और हम लोग सुराही का पानी पीते थे

स्टेशन पर उतर कर हम बैलगाड़ी या घोड़ा गाड़ी जो भी मिलता था उसमे बैठ जाते थे तब गाँव मे कच्ची सड़के थी रिक्शे और कोई भी साधन नहीं थे

हम लोग घोड़ा गाड़ी मे चढ़कर गाँव के लिए रवाना होते थे अपने पापा से चिपक कर बैठते थे क्युकी घोड़ा बहुत तेज भागता था

रास्ते मे घोड़ा भूखा प्यासा हो जाता था तो घोड़े वाला कुछ समय तब उसको खाने के लिए रोकता था

इतनी देर मे हम लोग हरे भरे खेत मे खूब खेलते हुए आम तोड़कर खाते थे

जामुन होते थे मगर कच्चे

दो घंटे के बाद गाँव आ जाता था वहाँ पर हम लोगों की दादी बाबा हम लोगों के लिए गुड़ का शर्बत बनाते थे और दादी हमे खूब प्यार करती थी

क्या समय था वो

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