मिलती हू जब मै अपनी पुरानी यादों से

कुछ ऐसी बातें होती है जो बीत चुकी है फिर भी वे.कभी ना कभी यादों मे लौट ही आती है भूलने लगे तो और भी याद आती है

वे सावन के झूले जो झकझोर देते थे कभी बारिश की हल्की बूंदों से, वो सावन की ठंडी हवा वो नीम का पेंड वो मीठे मीठे आम, वो काली घटाओं का आना एक दूसरे के साथ आना और पानी बरसा कर चले जाना

माधुर्य आवाज मे मोर का बोलना जैसे कि वो मोरनी को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है

छोटी छोटी चिडियों का खुश होकर गड्ढा के भरे हुए पानी मे नहाना

खेतों का हरा भरा होना

नदियों का हिलोरें लेना

ब्याहता ल़डकियों का अपने मायके मे आना और बाग मे पेड़ों पर झूला डालकर सावन के गीत गाना और एक दूसरे को झूला झुलाते हुए हंसना बहुत याद आता है

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