
कुछ ऊंट बैठे हुए थे भयंकर धूप मे मैं कालेज से वापस आ रही थी मैंने देखा कि कुछ राजस्थानी लोग इनके ऊपर सामान लाद रहे थे
मुझे बड़ा अचंभा हुआ कि ये ऊंट यहां कानपुर मे क्या कर रहे हैं अब मैं रुक कर उन ऊंटों को देखने लगी कितने लंबे ऊंट थे मैंने कभी ऊंट इतने पास से नहीं देखे थे वो भी चार चार
ये सब प्यासे थे लेकिन मैं क्या कर सकती हू इनके लिए
सब इनसे काम तो खूब करवा रहे थे परंतु इनका कोई ध्यान नहीं दे रहा था
अब एक ऊंट गुड़ गुड़ गुड़ करने लगा उसके मुह से झांग निकलने लगा अब वो शायद बहुत गुस्सा हो गया था वो शायद अपने मालिक से कुछ कहना चाहता था
पास मे एक बाल्टी रखी थी वो इसको चांट रहा था लेकिन सब उनको हट हट करके उसकी रस्सी खींच लेते थे अब उसे सहन नहीं हुआ
थोड़ी देर तो वो वहाँ खड़ा रहा लेकिन थोड़ी देर के बाद उसने अपने मालिक की खोपड़ी अपने मुह मे दबा ली और ऊपर की ओर उठा ली उसके दांत उसकी खोपड़ी मे लग गए और उसके खून बहने लगा
अब मैने जब ये दृश्य देखा तो मेरे होश उड़ गए मैंने देखा कि कुछ लोग उसे ऊंट के मुह से छुडाने कि कोशिश कर रहे हैं लेकिन जब उसने उसे छोड़ दिया तब बहुत देर हो गई थी उस आदमी ने वहीँ पर दम तोड़ दिया मैं वहां से तुरंत भागी वहाँ पर देखने वालों की भीड़ जमा हो गई थी कोई उसे बचा भी नहीं पाया
इससे एक बात सोंचने पर मजबूर कर देती है कि जानवरों से काम तो खूब कराते है परंतु उसे क्या चाहिए उसकी सुविधा का ध्यान नहीं रखते हैं अखिर जानवर कहाँ तक सहे वो भी आक्रामक हो जाता है
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