प्रकृति का बदला

लोग प्रकृति के साथ कितना गलत कर रहें है अपने स्वार्थ के लिए उसको प्रताड़ित कर रहे हैं उसी प्रकृति ने जीने के लिए साँस दी है, उसकी ही छाँव मे सब पलते है उसी की गोद मे सब खेलते है उसी का दिया हुआ सब खाते है

लेकिन लोग कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं प्रकृति को, उसकी सुंदरता को नष्ट कर रहे है जबकि प्रकृति की धरती पर ही उगा अन्न खाते है उसके पेड़ों को काट रहे हे

पहाड़ों मे सूराख कर रहें है

सुंदर सुंदर पशु पक्षियों को मारकर खा रहे है

धरती से छेद कर के जल निकाल रहे हैं

अब बाढ़ आ गई जब पेंड और पहाड़ ही कम हो गए तो वर्षा का जल कहा जाए

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