प्रसव पीड़ा की अनुभूति

कैसी होती है प्रसव पीड़ा की अनुभूति

एक बच्चे के जन्म से पहले का अनुभव जिस अनुभव के लिए एक महिला कितनी बार कितने दर्दों को सहती है

लकिन फिर भी उसे इंतजार रहता है इस दिन का तब भी वो माँ बनने के लिए किस तरह से तैयार रहती है

उसे पता होता है कि अंग अंग दर्द से तड़पता है लेकिन वो इस दर्द को सहने के लिए हरदम तैयार रहती है

जब जन्म लेने के लिए कोई जीव निकलना चाहता है धरती पर जन्म लेना भी किसी के लिए आसान नहीं होता

हर नारी का सम्मान यही है जन्म वो एक माँ बनकर प्रसव पीड़ा को सहती है

किस तरह से वो अपने रोम रोम मे एक झुलसती हुई वेदना मे रहती है

प्रसव वेदना मे आंख मूँद कर अपने दर्द को सह जब खून की लहर सी बहती है

तब एक महिला किस तरह से एक उम्मीद बच्चे की लेकर इस दर्द को सहती है

कभी चीत्कार करके लेकिन कभी जब वो इस धरती से कहती है कितने दर्द वो झेल चुकी है ये धरती भी सहती है

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