गाँव की जिंदगी

गाँव की भी एक जिंदगी होती है वो लोग भौतिकता से दूर प्राकृतिक माहौल मे रहते हैं अभी भी कुछ गाँव ऐसे भी है जहा बिजली नहीं है लेकिन आज ज्यादातर गाँव मे बिजली की सुविधा है

गाँव के घर कच्चे होते थे लोग खेत के उगे अन्न पर निर्भर होते थे

गाँव का जीवन बहुत कठिन होता है, सर्दी मे शीत लहरों का प्रकोप हो जाता था बूढे और बच्चों के लिए ये मौसम बहुत ही तकलीफ देह होता है

लोग आग तापते है, गाँव मे गैस नहीं होती थी लकड़ी के चूल्हा पर महिलाये खाना बनाती थी

प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता था आँधी आने पर कितने सारे पेंड गिर जाते थे कितने छप्पर उड़ जाते थे कुछ घर टूट भी जाते थे

गाँव की बाजारो मे भी जरूरत का पूरा सामान नहीं मिल पाता था वहां की बाजारों मे घई ,गुड़, शहद, बेट की डलिया, पंखे, सूती कपड़े आदि मिलते है वहां पर वही सामान मिलता था जो गाँव के लोग खुद तैयार करते थे दवा, साबुन, मंजन, आदि शहर से लाया जाता था

गाय, भैस पालन करते थे गाय ,बकरी कुत्ते आदि जानवर पाले जाते थे बकरी के बच्चों को शहर मे मांस के लिए बेंच देते थे

गाय भैस का दुध बेंच कर गाँव के लोग अपना खर्चा चलाते थे उसी पैसों मे साबुन, कपड़े और भी छोटी मोटी चीजे ले आते थे

वस्तुएं खरीदने के लिए अनाज का प्रयोग करते थे जैसे आपको साबुन लेना है तो दुकान मे साबुन के बदले अनाज दे देते थे

गाँव में जब कोई बीमार होता था तो गाँव से मिलने वाली पत्तियो या जड़ी बूटियों से उसका इलाज करते थे अगर कोई ज्यादा बीमार हो जाता था तो उचित इलाज ना मिलने के कारण उसकी मौत हो जाती थी

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