कभी आँधी मे घिर जाता था वो, कभी घिरता था वो तूफान मे लेकिन बच कर निकल जाता था क्योंकि अभी बहुत कुछ देखना बचा था उसका
दीपक भी जले थे उसकी राह मे पर किस्मत का दोष ही कहिये उसके दिए को तेल भी ना मिल सका, फडफडा कर रह गया वो था इस कदर बेबस
निकलती रही आह उसकी साँस से पर ना जाने क्या गुनाह था उसका जो साँस रुकती रही और वो तड़पता रहा साँस आई भी तो क्या एक बया कर गई कि वो मजबूर था
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