घंटीराम ने अपने गुरु गुरुघंटाल से पुछा कि गुरुदेव मै सोचता हूँ पुराना आदमी बिल्कुल देवता समान होगा…स्वर्ग जैसा महौल था…अब तो चारो तरफ हहाकार हैं तो आदमी अपने को कैसे बचाये….कुछ पहले के समय की बात बताये???
गुरुघंटाल ने कहा घंटी
तुम ने बहुत ही अद्भुत बात की हैं। आदमी को समझने के लिए उसका अतीत और वर्तमान देख कर ही उस के भविष्य का फैंसला लिया जा सकता हैं…इस से ही इस बात का भी पता चलता हैं कि आदमी के जीवन में कब कब धर्म की कितनी जगह रही…. चलो देखते हैं …समझते हैं….
आदमी जब से आदम था तब से ही तृष्णा ने उसे पकड़ रखा हैं। क्या फर्क पड़ता हैं उस समय पक्के मकान नहीं थे ,अपने मकान की तृष्णा न थी मगर फिर भी उस के पास जो गुफा होगी उसी को थोडा और बड़ा करना चाहता होगा कि पांव पुरी तरह पसर नहीं पाते…अब पत्थर की गुफा यदि छोटी , उस में कोई रोशनदान नहीं मगर बहुत हद तक सुरक्षित हैं। रेंग कर भीतर चले गये और सो लिये…. फिर जब स्त्री का प्रवेश उस के जीवन में हुआ तो जगह बहुत कम लगी होगी तब तो फिर उस ने घर बडा करने के लिए न मालूम कैसे कैसे अविष्कार कर लिये होंगे..
आदमी जब अकेला है तो उसे कुछ ज्यादा इच्छा नहीं रहती कभी भी कही भी निकल जाए एक आदमी का पेट पुरा न भी भरे तो अगली बार सही मगर जब एक ने चार पांच के लिए इंतजाम करना हो तो मामला कठीन हैं। एक पिता के मुखिया होने का यही तो राज हैं। वह सब को देखता हैं…सब का ख्याल रखता हैं। पिता सर पर हो तो किसी बेटे को बहुत समय तक फिकर कहा होती हैं। यह तो जब वह पिता बनता हैं तो फिर फिकर ही फिकर रहती हैं। अपने को भूखा रखकर भी बच्चों को देना पडता हैं उस के लिए उसे बच्चों की माँ यानि स्त्री प्रेरित करती हैं….अपनी अदाओं का अकृषण बनाये रखती हैं….
इस प्रकार स्त्री भी आदमी की फेहरिस्त में प्रथम स्थान पा लेती हैं। जब कमाई ही …यानि कितना कमाता हैं….ही….आदमी का गुण बन जाए तो आदमी ने भी अपनी आमदनी को बढाया ताकि वह भी सुंदर से सुंदर स्त्री को अकृषित कर सके। कुछ हद तक तो ठीक मगर आदमी कुछ भी कर के भी स्त्री की फेहरिस्त में अपना स्थान प्रथम न बन सका…..
बहुत आमीर आदमी को भी छोडकर औरत चली जाती हैं। आमीरी में आदमी भी सोचता हैं तू नहीं ओर सही ओर नहीं ओर सही…. ऐसे में न तो स्त्री आदमी को समझ पाती हैं और न ही आदमी स्त्री को समझ पाता हैं….दोनों ही एक अंतहीन प्यास को बुझाना चाहते है जो कि असंभव हैं….यह कहानी बडी पुरानी हैं पर नितनूतन भी हैं…..
घंटी, फिर धीरे धीरे जब आदमी परेशान हो गया तो उस ने इस बीमारी को ढूंढने की कोशिश की…न जाने कितने समय कितनी मुश्कत के बात बीमारी का पता चला होगा। फिर बहुत समय और बहुत मुश्कत के बाद बीमारी का इलाज पता चला होगा।
घंटी बुद्ध ने एक विज्ञानिक की तरह इस का पीछा किया …बहुत मेहनत की ……उस समय के बहुत बडे बडे गुरुओं के पास गये। मगर मानव की परेशानी का कोई सार नहीं हाथ लग रहा था। फिर एक दिन भोर का तारा टुट रहा था तब बुद्ध ने यह जान लिया की आदमी के दुख का कारण तृष्णा हैं। इस से पहले ऋषियों ने मनीषियों ने कभी चंचल विचार ,चंचल मन, चंचल बुद्धि , कमजोर मनोबल ,कमजोर इच्छा शक्ति.. इंद्रियों को…काम क्रोध लोभ मोह अंहकार आदि को आदमी के दुख का कारण समझा। बुद्ध एक मात्र ऐसे व्यक्ति जिस ने सब छोड दिया और एक ही बात कही कि मानव के जीवन में दुःख हैं… तृष्णा मानव के दुःख का कारण हैं और दुःख का निवारण मेरा मार्ग हैं।
घंटी, बुद्ध के समय तक भी आदमी छोटी छोटी बातों पर लड़ता झगडता रहता था। बुद्ध के अपने राज्य में पानी के लिए लोग लड़ते थे और पानी के लिए खुन बहाते थे…यहीं से बुद्ध जीवन में मोड़ आया और वह इस बात कि… मानव ऐसा क्यों हैं का उत्तर ढू़ढने निकल पडे। बुद्ध ने उत्तर ढूंढा बहुत से लोग आंदोलित हुये मगर वह जो जिन की प्रतिष्ठा दाव पर लगी थी , जिन को कुछ भी ज्ञान न होने से उन का आदर निरादर में बदल रहा था वह कब चाहते थे कि मानव सुखी हो जाए…शांत हो जाए …जागृत हो जाए। वह तो आदमी को आदमी से लडाते रखना चाहते थे। इस में सब से बडा कारण था कि बुद्ध के मार्ग में परमात्मा का आत्मा का कोई स्थान नहीं था तो जो लोग आदमी को कभी परमात्मा के नाम पर ,कभी स्वर्ग नरक के नाम पर, कभी पिछले जन्म के कर्मों के नाम पर तो कभी आने वाले समय के या जन्म में कुछ अच्छा करने का लालच …और नहीं तो दुसरे धर्मों से मुकाबला ,अपने को श्रेष्ठ कहना या किसी दुसरे धर्म कि ताकत या बुराई बता कर लोगों को भयभीत करना। उन्हें विरोधी समझ उन को मारना…यह सब धर्म के नाम पर हुआ है…हो रहा हैं और होता रहेगा।
घंटी , बुद्ध के धर्म में तो ऐसा कुछ नहीं था। वहां तो केवल लोग शील का पालन कर अपने को तैयार करें फिर दीक्षित हो अपना नीजी कल्याण करें। जागृत हो उसे बांटे जो उन्होंने पाया हैं। यह सरल सुगम मार्ग किसी को क्यों पसंद आएगा जिन्हें कुछ भी मेहनत न कर केवल मनघडंत बातों से ही सम्मान प्राप्त करना हैं …यह तो आदमी की बेहोशी पर ही निर्भर हैं। होशपूर्वक आदमी क्यों किसी की बात मानेगा…वह खुद जानेगा…बताने वाला कहेगा कि मैने जान लिया अभी तुम्हें जाननी की क्या जरूरत हैं तुम तो हमारे पैर छुओं और जो हम कहते हैं उसे ही सब समझो उस पर शंका न करो…..
घंटी ,यह प्रयोग जिस से आदमी दुख से …समझ लो …मै कष्ट से नहीं कह रहा हूँ …कष्ट तो शरीरिक हैं…वह तो एक दिन चला जाऊगा…बडे से बडा घाव भी भर जाएगा…दुःख से छूट जाए। दुःख जो हैं वह भाव हैं मनोवैज्ञानिक हैं। आदमी के पास बहुत कुछ होने पर भी वह दुखी हो सकता हैं।
घंटी ,तुम कहते हो मै पुराने आदमी के बारे में बताऊ….नचिकेता की कहानी कठो उपनिषद की कहानी हैं….यदि हम उसे बहुत सनातन मानते हैं तो नचिकेता का पिता …भविष्य के सुख की तृष्णा से भरा हुआ यज्ञ कर रहा हैं…उस की यह हालत देख ही तो नचिकेता मृत्यु की तरफ चल पडा….पुराने से पुराने , सनातन से भी सनातन में भी तुम ज्यादातर बेहोश मानवों को ही पाओंगे। बुद्ध के पहले की बात करना बेईमानी हैं मगर तुम बुद्ध के बाद के आदमी को भी देखो उस को मार्ग बताने के बाद भी क्या वह तृष्णा को पहचानना चाहता हैं….अपनी बेहोशी को तोडना चाहता हैं….नहीं घंटी नहीं…आदमी शुरु से ही ऐसा रहा हैं…देव के साथ साथ बहुत संख्या में दानव रहें हैं…मजा यह हैं कि देवो और दानवों के पिता एक…उनके गुरुओं के पिता भी एक….तब भी आदमी बेहोशी में खुश हैं। हम लोग रामायण में रावण को देखते हैं मगर रावण की कथा तो ब्रह्मा विष्णु शिव …की त्रीमूर्ती से ही आरभ्य हैं। और कितना पीछे चले…
घंटी , आज भी लोगों को गोरख, महावीर , बुद्ध , नानक के मार्ग चलने के लिए न्यौता दो…तो वह बताने वाले का दुश्मन हो जाएगा। एक एक आदमी अपने गिरेबान में झांक कर देखे…सब बस एक दुसरे को धोखा दे रहे हैं….बातों का ,शाब्दिक ज्ञान बढाना चाहते हैं जिस से थोडा आदर पा सके….आदर की चाह करते मैने बहुत देखे हैं मगर आदर मिलता नहीं….क्योंकि तृष्णा का स्वभाव न पुरा होना हैं…..
सनातन से सनातन समय में भी आदमी ऐसा ही था , ऐसा ही है और ऐसा ही रहेगा…
इस पुरे संतसंग का उद्देश्य समझो कि सत्य के लिए वातावरण कभी भी इतना सुगम नहीं होता मगर जब कोई सत्य को पाने की डगर पर चलता है तो मार्ग चलते चलते सुगम होता जाता हैं क्योंकि सत्य का आलंबन सबल हैं…..
आज इतना ही….
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