ओशो ज्ञान की कुछ बातें

पढ़ो आकाश को
क्योंकि वह शास्त्र हैं
सुनो शून्य को
क्योंकि वही मंत्र है
जियो मृत्यु को
क्योंकि वहीअमृत है….

पढ़ो आकाश को…वही शास्त्र हैं क्योंकि सब आकाश से ही अवतरित होता हैं। एक बार नीचे ,नर्क को देखने की आदत छूटे और ऊपर श्रेष्ठ को देखने के लिए नजर उठ गई तो फिर तुम्हारा जो नाता हैं वह नीचे से कट कर ऊपर जुड जाता हैं…मूलाधार से छूट सहस्त्रहार की तरफ निकल पडते हो…..यह अवस्था तभी उपलब्ध होती हैं जब बाहर से जितना भी ज्ञान शास्त्रों से या सुन कर इकट्ठा किया हुआ हैं वह भीतर दोहराना बंद नहो जाए… यह अवस्था केवल लंबी मौन साधना से ही उपलब्ध होती है….
सुनो शून्य को …वह मंत्र है…क्योंकि वह शून्य तुम्हें इतना सवेदनशील कर देगा….एक बात याद रखो…तुम्हारे लिऐ भीतर कोई तानपुरा , बंसरी , सारंगी ,किंगरी या कोई साज नहीं लिये बैठा हैं। तुम्हें केवल शून्य को सुनना जब सब आवाजे बंद न हो जाए तब रुकना…जो जो आवाजे भीतर समृति में है वह भी ऊभर ऊभर कर आंएगी तुम हैरान हो जाओंगे कि ऐसी आवाज मैने कभी नहीं सुनी …सुनी होगी मगर संसार की आपाधापी में ध्यान न दिया होगा….तुम किसी भी आवाज़ पर रुकना मत किसी भी आवाज को पकड़ना मत ….किसी सुक्ष्म आवाज को लेकर तुम गुरु के पास जाओंगे तो यदि गुरु उस आवाज तक नहीं पहुंचा तो इंकार भी कर सकता हैं मगर यदि उस ने भी सुनी होगी तो समझ जाएगा कि शिष्य ठीक राह फर चल रहा हैं। गुरु आगे बढने के लिए भी कह सकता है और उसी आवाज के जादू मे तुम्हें रोक भी सकता हैं।
इस लिए ओशो कहते हैं…सुनो शून्य को क्योंकि समाधि में भी कोई आवाज़ नहीं आती। यदि समाधि में भी आवाज या कोई मधूर आवाज आ रही है तो साधक एक इंद्री जो कि सुनने का काम करती है जिसे कान कहते हैं उस के साथ अपना नाता बनाये हुये हैं। तुम तो बस जाते रहना …होशपूर्वक शून्य मे ठहरने का मतलब होशपूर्वक समाधि अवस्था निर्विकल्प समाधि हैं….यह बहुत दिनोंके मौन साधना के बाद उपलब्ध होती हैं….
जियो मृत्यु को….जीवन को तो तुम कुछ भी करते करते जी सकते हो। संसार में बहुत से लोगे आई सी यू में मृत छईया पर सालो से लेटे हैं। विज्ञान के यंत्रों के हवाले से वह जिवित हैं। बहुत संख्या में बेहोश लोग जिन का कोई भी कार्य तुम इंसानियत के हित में नहीं कह सकते कभी कभी कुछ जेलो में भी रहते हैं मगर जिवित हैं। एसा जीवन तो से तो कोई आत्महत्या कर के ही छूट सकता हैं। लोग जी रहे है क्योंकि मौत नहीं आती …घीसड घीसड कर भी जीना चाहते हैं क्योंकि बहुत इच्छाओं से बंधे हैं….
मगर कोई निर्भय …निडर …मौत की आंख से आंख मिला कर जीने वाले से कभी कोई मिल ले तो उस का दिल दहल जाता हैं उस ने सपने में भी ऐसा जीवन की कल्पना नहीं की होती….
यदि केवल दोजख में जीने को जीना कहते या थोडा व्यवस्थित जीना ही जीना होता तो ओशो भी तुम्हें कुछ सिद्धांत , कुछ असूल ,कुछ प्रार्थनाएं ,कुछ मंत्र ….कोई तबीज दे जाते क्योंकि जीना तो प्रकृति की अक्सप्यरी डेट तक पडेगा ही कोई कोई आमीरी में तो कोई कोई गरीबी में तंग हलात में जी जाता मगर ओशो ने कहा ….मै मृत्यु सिखाता हूँ…..जीना सीखाता हूँ ऐसा नहीं कहा….मृत्यु के देवता ने भी नचिकेता को लंबी से भी लंबी आयु जीने का वरदान मांगने को कहा था… मगर नचिकेता ने उस अमरण जीवन को अमृत न जाना और अमृत्व का राज बताने के लिए यमराज को अनुरोध किया…
जिन्होंने ने जाना उनका कहना हैं कि मृत्यु न हो तो धर्म का यानि स्वभाव का कोई महत्व नहीं क्योंकि जो जैसा मृत्यु को प्राप्त होगा वैसा ही आगे की यात्रा का नक्शा लेकर आगे बढेगा….जियो मृत्यु को क्योंकि उस में अमृत छुपा हैं…..
मृत्यु की खबर भी बगैर लंबी मौन साधना के बगैर अनुभव में नहीं आती …सब तरफ से मौन हुये बगैर कोई चारा नहीं….कभी कभी तो लंबे मौन और साथ साथ लंबे उपवास से भी सहायता मिलती हैं जैसे बुद्ध को हुआ…
आज इतना ही….

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