प्रेम में झगड़ा भी तभी तक होता है जब तक हम किसी दूसरे से कोई अपेक्षा करते हैं..स्त्रियाँ पहले लड़ती है झगड़ती है रूठती है
मनाती है..मान जाती है ..ऐसा स्त्रियाँ तभी तक करती है जब तक वह प्रेम की उम्मीद नहीं छोड़ती है..जब वह देखती है पुरुष पर उनके रूठने मनाने झगड़ने चिल्लाने का कोई असर नहीं हो रहा है तो चुप हो जाती है स्त्रियाँ.. छोड़ देती है उस पुरुष को हमेशा के लिये बहुत घातक होती है स्त्रियों की चुप्पी…कुछ स्त्रियाँ लम्बी चुप्पी के बाद छोड़ देती है उस पुरुष के घर को और कुछ घर में होकर भी नहीं होती पुरूष के साथ ..अहंकारी पुरुष कभी नहीं समझ पाते स्त्रियों के कोमल मन को…स्त्रियों की चुप्पी
भर देती है घर में नकारात्मक ऊर्जा अब नहीं साफ़ करतीं वह सोफ़े की धूल नहीं बुहारती वह घर आँगन को नहीं करतीं वह कोई श्रंगार..नहीं खनकती उसके हाथो में चूडियां पैरों में पायल धीरे-धीरे कम कर देती है वह अपना हर श्रंगार…अव्यवस्थित कर देती है वह पूरे घर को…रहती है वह घर में लेकिन घर उसके दिल में नहीं रहता…छोड़ देती है वह उस घर को उस पुरुष को मन से दिल से….धीरे-धीरे चली जाती है लक्ष्मी सरस्वती दुर्गा उस घर से….जहाँ होता है स्त्रियों का अपमान…जिस घर में खिलखिलाती है स्त्री..वहीं वास होता है दुर्गा का
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