
हमारे माता पिता होते हैं, हमारे भाई बहन होते हैं, फिर हमारे मित्र आ जाते हैं वो रहते हैं हमारे साथ, उसके बाद हमारा जीवन साथी आ जाता है, फिर हमारा बेटा होता है या बेटी होती है, हमारे पड़ोसी भी होते हैं
हम हमेशा इस गलतफहमी मे होते हैं कि हमारे साथ लोगों की भीड़ है हमे क्या चिंता
लेकिन कुछ दिनों बाद हमारे माँ बाप विलीन हो जाते हैं इस दुनिया से
हमारे भाई बहने भी अपनी दुनिया मे खो जाते हैं
मित्रों की भीड़ भी कम होने लगती है
जीवनसाथी भी शायद नहीं रहता है तब हम बूढ़े हो जाते हैं
तब मैं और हमारा शरीर ही रहता है हमने कुछ भी संभाल कर अपने लिए रखा था कभी जब शरीर ठीक रहता है तब हम उसका प्रयोग कर पाते हैं और तब तक अपना जीवन जी लेते हैं जबतक हमारा शरीर चलता रहता है
हमारा शरीर जब साथ देना बंद कर देता है तब हम अपनों को करीब से महसूस करते हैं
अब हम ये जीवन जीते है तब हमारा शरीर ही हमारा असली मित्र होता है
हमे अपने शरीर का पूरा ध्यान रखना है
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