दीपेन्द्र को खून सवार हो गया था वो उतना ही चिल्ला रहा था और वो उतना ही दौड़ रहा था वो दोनों आदमी अपनी जान बचाने के लिए एक बहुत बड़े कूड़े के ढेर मे छिप गए थे
दीपेन्द्र बिल्कुल भेड़िये की तरह आवाज़ निकाल रहा था कभी वो हंसता था कभी वो रोने लगता था वो बहुत ही व्याकुल सा लगता था तभी उसे एक खुली हुई कब्र दिखाई पडी उसमे एक लाश थी जो पूरी तरह से गड़ी नहीं थी उसके परिजन उसे जैसे तैसे गाड कर चले गए थे
दीपेन्द्र उसके पास जाने लगा और उसने उसके पैरों को आगे की ओर खींच दिया और जब उसने लाश को देखा तो उसे अपने दोनों हाथों से उठाया और बहुत दूर फेंक दिया
अब दीपेन्द्र ना जाने क्या चीज तलाश कर रहा था उसे ना जाने किस चीज की तलाश रहती थी ना जाने उसे ऐसा क्यों हो जाता था जब उसे ऐसा होने लगता था तब उसे पता चल जाता था
जब उसे पता चल चुका था तो उसने उस लड़की से कह दिया था कि अगर मुझे कोई दौरा पड़ेगा तो वो उसके पास उसे सम्भालने नहीं आएगी कहीं छिप जाएगी
इसलिए वो लड़की पास ही छिप गई थी लेकिन दीपेन्द्र ने उन दोनों आदमियों को कूड़े के ढेर मे छिपा हुआ देख लिया था वो गुस्सा हो चुका था शायद उसकी आत्मा किसी के खून की प्यासी हो चुकी थी उसने उन दोनों आदमियों को पकड़ने के लिए ज्यों ही हाथ बढ़ाया वो दोनों आदमी उठकर भागने लगे। क्रमशः

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