
हम जहाँ भी जाएंगे हमारी प्रारब्ध भी वही जाएगी
हमारे जीवन मे जो लोग भी आते हैं वे सब हमारी प्रारब्ध होते हैं उनसे हम कभी भी दूर नहीं जा सकते उनसे हम कहीं भी भाग नहीं सकते
कुछ लोग प्रारब्ध मे आते हैं हमे बहुत चोट पहुंचाते हैं हम उस स्थिति मे नहीं होते की उनसे लड़ाई-झगड़े करें या उनसे विवाद करें
उनसे लड़ाई-झगड़े ना करके हम तब भी अपने आपको अपनी बुद्धि से बचा सकते हैं
अब आप खुद ही देख लो मेरा बेटा मेरी प्रारब्ध है मैं इसे कभी भी नकारात्मक नहीं मान सकती मुझे परेशान भी बहुत करता है मुझे बहुत सारी ऐसी बातें कह देता है जिसमें मेरा कोई दोष नहीं रहता लेकिन
जब वो मुझपर आक्रामक हो जाता है तो मैं उससे उलझती नहीं मैं उसकी पूरी बात खत्म हो जाने देती हू मैं भगवान से कहती हू की शायद मेरा कुछ बाकी है इसके साथ तभी ये मुझे ऐसी बातें कहता है
अब मैं जब उसको कुछ नहीं बोलती मैं उसके सिर पर हाथ फ़ेर कर कहती हू बेटा कोई बात नहीं तुम मुझे बोल सकते हो
मैं चुपचाप जमीन मे लेट जाती हू और दो आंसू निकल ही जाते हैं क्योंकि उस समय मुझे बचाए इसकी उम्मीद मैं नहीं करती क्युकी मैं और मेरा बेटा अकेला ही होता है
थोड़ी देर के बाद वो सामान्य हो जाता है वो भी मेरे पास बैठ जाता है और चुप हो जाता है मैं उससे कहती हू बेटा और कुछ बाकी हो तो वो भी बोल दे
लेकिन वो चुप हो जाता है
मैं आश्चर्य करती हू की ये मुझे क्या क्या कहता रहता है शायद इसे कुछ पिछले जन्म की याद हो
लेकिन ये मुझपर तरस भी खाता है मैं बीमार होती हू तो मुझे पानी देता है और मेरे सारे काम यही करता है
मै सोचती हू की इसके कारण ही मुझे भगवान याद आते हैं यही मुझे भगवान याद दिलाता है मुझे इससे कोई कष्ट नहीं
अगर ये नहीं होता तो मैं संसार के मोह जाल मे फंसा चुकी होती
मैं ये कहना चाहती हू की किसी को भी खराब मत कहो, जो भी मिला है वो आपकी प्रारब्ध है उसका सामना शांति से करो और अपनी सोंच सकारात्मक रखो
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