अपनी फ़ेसबुक मित्र की कविता है ये मेरी लिखी नहीं है

उतनी खुशी मिले तुम्हें
हो काफ़ी जो
तुम्हारी रूह को रोशन
रखने के लिये

उतना दुख भी मिले तुम्हें
हो काफ़ी जो
तुम्हारे दिल को मोम
रखने के लिये

उतना प्यार मिले तुम्हें
हो काफ़ी जो
तुम्हारे लबों पे मुस्कुराहट
रखने के लिये

उतना बिछोह मिले तुम्हें
हो काफ़ी जो
तुम्हारी आँखों में इंतजार
रखने के लिये

उतनी ख़्वाहिश पूरी हो तुम्हारी
हों काफ़ी जो
तुम्हारी चाहतें ज़िंदा
रखने के लिये

उतने ख़्वाब टूटें तुम्हारे
हों काफ़ी जो
तुम्हें हक़ीक़त की समझ
रखने के लिये

उतनी मँजिल पायो तुम
हो काफ़ी जो
तुम्हें सफर में कदम
रखने के लिये

उतने रास्ते भटको तुम
हो काफ़ी जो
तुम्हें नयी मँजिल की चाहत
रखने के लिये

उतनी धूप मिले तुम्हें
हो काफ़ी जो
हर अँधेरें में रोशनी
रखने के लिये

उतनी बरसात मिले तुम्हें
हो काफ़ी जो
मन में सोंधी नमी
रखने के लिये

यही दुआ है मेरी मिले तुम्हें
हर स्वाद हर रंग जीवन का
पर न ज़्यादा हो न हो कम
हो सिर्फ़ काफ़ी

-मेजर(डा) शालिनी सिंह

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