
शाम आ गई है जीवन की
अंधियारा अब घिरता जाए
अपनों का ही ध्यान रहा बस
जीवन अपना कब जी पाए।
घर घर की है यही कहानी
कोई कहे कोई चुप रह जाए
आंगन में फलते पौधों पर
झूम झूम कर दिल यह गाए।
दीपक मन का बुझ ना जाए
धुआं धुआं बाकी रह जाए।
यह चिंता तो करनी होगी
तेल दीए में ना घट पाए।
अंधियारे को जीते फिर भी
रातें रौशन कर ना पाए।
तन मन प्यासा अंदर बाहर
सावन जब चाहे आ जाए।
मस्त चाल ऐसी मत चलना
आंखों की चुभन बन जाए।
राह देख कर संभलना सीखो
पहले कि ठोकर लग जाए।
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