एक बार एक बहु को ससुराल के सभी लोग बहुत तंग करते थे सास उसे खाने को ना देती, पति को सब भडका देती बाद मे पति भी उसे बुरा भला कहते
जो भी कपड़े, मिठाई, पैसे मिलते थे वो भी सब छीनकर खा जाते, एकदम बहू कंगाल और भिखारियों की तरह बैठी रहती
वो इतनी सीधी थी और डरपोक भी थी, उसके घर वालों ने उसे दब्बू बना दिया था
यही शिक्षा देकर भेजा गया कि सभी लोगों की सेवा करना किसी को उत्तर ना देना
लेकिन एक शिक्षा और भी देकर भेजी गई थी जो उसे नहीं याद आ रही थी
अब एक दिन बहू की तबियत खराब हुई सब उससे बहुत काम करवाते सारे लोग बैठ कर टीवी देखते
बहू बड़ी कमजोर हो गई थी कोई उसके मैके से कुछ मिठाइयाँ और उसके लिए कुछ सामान लाया था उसका मायका बड़ी दूर था
अब उस सामान पर भी सास ने पहले ही कब्जा कर लिया और सब मिल बांटकर उसी के सामने खाते और उसे ना देते वो बिचारी मन मसोस कर रह गई
वो कमजोर हो चुकी थी और समय से पहले ही बूढ़ी हो गई थी पति भी उसे तिरस्कृत करने लगा था कि जो अपने पति को संतुष्ट ना कर सके ऐसी शादी ही क्या
निकल जाओ मेरे घर से तुमसे कुछ नहीं होता
यही बात बहू को चुभ गई
उसको समझ मे आ गया कि संस्कार वहां चलते हैं जो उनके योग्य होता है इन दुष्ट लोगों के साथ अनुकूल करना ही पड़ेगा
उसने अपने पति से कहा कि अब मैं अपने घर नहीं जाऊँगी तुम मेरे पास मत आना मैं अलग तुम अलग
अब दूसरे दिन से ही उसने अपनी दिनचर्या ही बदल डाली बोलती कुछ नहीं थी
सुबह जल्दी नहा धोकर पूजा कर लेती चाय बना देती नाश्ता बना देती सबका नाश्ता रख आती और पहले ही अपना नाश्ता वो निकाल लेती थी
सास ने कहा अब तू मालकिन बन गई मैं दूंगी सबको तूने क्यों दिया
बहू ने कुछ नहीं कहा,वहां से हट गई सास ने सबको नाश्ता दिया और थोड़ा सा कढाई मे छोड़ दिया जैसे रोज करती थी
अब बहु ने अपना दृष्टिकोण ही बदल डाला ठीक से खाने पीने लगी
सास के सामने ही वो मिठाइयाँ खा लेती अच्छे-अच्छे कपड़े उनकी अलमारी से निकाल लेती
अब एक महीने बाद वो फिर से ठीक हो गई पति तो आता नहीं था एक दिन पति ने उसे देखा तो उसपर बहुत खुश हुआ पत्नी ने कहा कि सारा पैसा अम्मा को दे दो लेकिन कुछ मुझे भी दो
वो भी छीन छीन कर खाने लगी आराम से रहने लगी शिक्षित थी किसी से बेकार की बहस न करती
उतना ही सहना चाहिए जितना सम्भव हो
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