मेरे ससुर जी रोज किसी एक गरीब को चाय और बीड़ी पिलाते थे

मैंने अपने ससुर को देखा था वे सुबह चाय पीते थे साथ मे एक छोटा था मिट्टी का कप लेकर बैठते थे अगर उतने समय कोई आ जाता था तो उसे अपने गिलास मे से चाय जरूर पिलाते थे तब वे चाय पीते थे

उनके पैसे दूसरों के ऊपर खर्च हो जाते थे सब लोग उन्हें डांटने लगते थे कि अब अपने लिए भी कुछ पैसे बचा कर रखो

वे कहते की मेरे क्रिया कर्म का पैसा रखा है बुढ़िया के लिए भी रखा गया है मेरे लड़के कमाते है मुझे अब पैसों का क्या काम

वे रास्ते मे पागलों और गरीब बच्चों को जलेबी पूरी सब्जि खिलाते थे

वे कभी भी बीमार नहीं पड़ते थे दुध पीते थे, बीड़ी भी पीते थे और बड़े मस्त रहते थे खुशबूदार तेल, अपनी पसंद का साबुन और अपनी पसंद की वस्तुएं ही प्रयोग मे लाते थे मुझे भी खाने को कुछ ना कुछ लाते रहते थे

उनका कहीं ना कहीं से खर्च पूरा हो ही जाता था और उन्हें धार्मिक ग्रंथों का भी ज्ञान था वे खूब तेज चलते थे और दूर की वस्तुएं भी देख लेते थे

बहुत जल्दी सुन लेते थे

मुझे हर समय कहा करते थे कि बहू शरीर से बढ़कर कुछ नहीं होता तुम ठीक से अपनी देखरेख करो

अक्सर मुझे समझाते रहते थे कि खुश होकर रहा करो

मेरे बाबु जी मुझे अभी भी बहुत याद आते हैं मुझे दुकान ले जाते थे वहां पर मुझे मेकअप का सामान दिलवा देते थे सास चिल्लाती थी कि ससुर होकर बहू को ये सब दिलाते हो

तो कहते ये मेरी बेटी की तरह है हम नहीं दिलवाने जाएंगे तो इसको कौन देगा तुम तो इसको भिखारियों की तरह रखती हो अभी इसकी उम्र है खाने खेलने की, तुम तो अपनी उम्र मे खूब लगाती थी

मेरे पीछे सबसे लड़ जाते थे

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