कामिनी ये सब देखती थी उसे कुछ बुरा ना लगता क्योंकि वो आदी हो चुकी थी उसके खानदान मे ये हुआ ही करता था
अब नाच गाना और खाना पीना हो रहा था कामिनी अपनी कमरे मे अकेली थी लेकिन कमरे मे उसका मन नहीं लग रहा था और वो छत पर चली आई थी वो देखती है कि आज की रात कुछ नई नई लग रही थी ये वो रात है जो शायद जीवन मे नहीं भूलेगी उसके सपने शायद पूरे होने वाले थे
तभी पीछे से एक अवाज आती है वो पीछे मुड़कर देखती है तो पीछे वीर सिंह खड़े थे कामिनी वीर सिंह को देखती है वीर सिंह उस समय नशे मे थे उन्होंने शराब पी थी और वे कामिनी की तरह देखे ही जा रहे थे
कामिनी ने उन्हें देख कर अपनी नजरे झुका ली और तभी ठाकुर वीर सिंह कामिनी की तरफ बढ़ने लगे कामिनी अकेली थी
ठाकुर वीर सिंह उससे कहते हैं कि मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सम्भाल लो कामिनी, क्या ऐसे ही खड़ी रहोगी
और वे कामिनी का हाथ पकड़ लेते हैं कामिनी का मुलायम हाथ अपने हाथों मे दबा कर कहते हैं कि कितना खूबसूरत और मुलायम हाथ है चांदनी रात मे तुम और भी खूबसूरत लग रही हो मेरी तो धड़कन बढ़ रही है तुम्हें देखकर
क्रमशः

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