सब्जबाग है ये दुनिया

पानी का बुलबुला है ये दुनिया यारों दिखता है सब अपना लेकिन होता है सब सपना

कब टूट जाते हैं ये अनमोल से अनमोल रिश्ते जिनपर हमे होता है विश्वास है कितना

लेकिन ये सब बुलबुला है कुछ गायब हो जाते है कुछ कभी ना आने के लिए चले जाते हैं

सब सुख दिखते है स्थिर लेकिन कब बादल बनके उड़ जाते हैं

कल कितनी भीड़ थी लोगों की लेकिन आज वो पत्तों की तरह बिखर जाते है

2 responses to “सब्जबाग है ये दुनिया”

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