एक संस्करण मेरी यादों का जो मुझे याद आया

मेरी चाची गाँव मे रहती थी वे सारा दिन काम करती रहती थी और जब वे खाना खाने जाती तो अक्सर खाना खत्म हो जाता था वे खाना नहीं बनाती थी उन्हें बर्तन साफ़ करने का काम और सफाई का काम दिया जाता, फिर वे गाय का गोबर उठाती, कपड़े धोती थी उनके पति भी उनसे बात ना करते

वे रोज बचा हुआ खाना खाती और फिर भी हंसती रहती उनको देख कर मैं दुख करती मैं उनके आसपास खेलती रहती वे मुझे कहानी सुनाती थी और अच्छी अच्छी बातें भी करती

मैं उनसे कहती चाची तुम रोज रोटी ही खाती हो सब लोग सारा खाना खा जाते हैं और तुम्हारे लिए कुछ नहीं बचाते

तो चाची कहती बिटिया मेरे माँ बाप नहीं है, मेरे घर से पैसा भी नहीं मिला, सामान भी नहीं मिला और मेरे बच्चे भी नहीं हुए इसीलिए मुझे कोई प्यार नहीं करता

मैं उनसे कहती की तुम चाचा को क्यों नहीं मारती हो वो तुमको रोज मार कर जाते है तुम्हें लगता नहीं है चाची कहती बिटिया मार खाते खाते मेरी पीठ की खाल मोटी हो गई है मुझे अब नहीं लगता है मारने दो वो कितना मारेंगे मुझे

वो थोड़ा सा आटा कहीं से ले आती और पुराने घर मे एक चूल्हा बनाकर ईंट का उसमे आलू भुन लेती और रोटी बनाकर खा लेती

उसके बाद कुछ दिन के बाद मेरी छुट्टियाँ खत्म हो गई पापा मुझे लेने आ जाते और मैं चाची से कहती चाची अपना ध्यान रखना

चाची कहती बिटिया ठीक से पढ़ाई करना, मैंने पढ़ाई नहीं की इसलिए मेरी ये दशा है

मैं सोचती की चाची के साथ ऐसा इसलिए सब करते हैं क्योंकि चाची किसी से कुछ नहीं बोलती सब सहती हैं अखिरकार उनकी क्या मजबूरी थी

चाची को चाचा ने छोड़ दिया और दूसरी शादी भी कर ली चाची अब भी उनके कच्चे मकान मे रहती है और देखरेख करती है चाचा अपनी दूसरी पत्नी के साथ शहर चले गए और चाची बीमार होकर बिना इलाज के मर गई

अन्याय को बढावा देने वाले हम खुद ही होते हैं जो विरोध नहीं करते

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