दौर के सिलसिले

उधर उस दौर मे हम शामिल थे लेकिन कोई मुफ्त मे नाम नहीं लेता, पैगाम देता है ये जीवन की ये तो मुसाफ़िर खाना है वो दौर भी लाजवाब था और ये दौर भी लाजवाब है और आने वाला दौर बेहिसाब होगा, जब हमे ज्ञान होगा लोगों का, अपनों का और अपनों मे मिले हुए परायों का, जो झूठी ताल्लुक की बात करते थे जो आज अनजान हुए हैं हमारे हालातों को देखकर कल क्या होगा उनका हम तो आज ही सावधान और सजग हो चुके

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