
जीवन के पड़ाव मे कुछ ऐसा होता है कि हमे स्वयं ही ऐसा लगता है कि शायद यहां पर हमारी जरूरत है और हम अपना योगदान निस्वार्थ देने लगते हैं चाहे मंदिर मे, चाहे गुरुद्वारों मे या मस्जिदों मे या चर्च मे और हमने देखा कि वहां पर समृद्धि ही समृद्धि दिखाई पड़ती है और योगदान देने से हमारी भी उन्नति होती है हर जगह ईश्वर का वास है सभी आत्मा वहां पर निवास करती है वहां पर देखने से ही लगता है कि किसी का बहुत बड़ा योगदान है जो किसी भी धर्म के मानने वाले लोग अपने अपने धर्म के प्रति श्रद्धा से प्रेम करते हैं
टिप्पणी करे