सब नियति का फल है जिसकी जैसी नियति

कभी कभी ऐसा लगता है कि अपने सामने अंधेरा है लेकिन कुछ ऐसा चमत्कार हो जाता है कि इंसान कुछ समझ ही नहीं पाता लेकिन अपनी सोंच के ऊपर भी किस्मत निर्भर होती है जैसी सोंच होती किस्मत की रेखा उसी के आधार पर बन जाती है आज कम है ज्यादा कि ना सोंचे पर्याप्त मिले इतनी सोंच ही होनी चाहिए

माँ भूख लगी है कुछ खाने को नहीं चाहिए मुझे बस मुझे तुम्हारे आंसू नहीं देखे जाते तुम रोया मत करो चलो देखते हैं आगे चलकर शायद कहीं सोने को ही मिल जाय

तभी एक मस्जिद दिखती है वहां पर नमाज पढ़ी जा रहीं थीं दोनों माँ बेटे वही पर बैठ जाते हैं और अज़ान बहुत ध्यान से सुनते हैं वहां पर कुछ लोग बैठे होते हैं तभी अंदर से मौलवी साहब निकलते हैं

बच्चा उनकी ओर देखता है और कहता है कि माँ ये कौन है इनकी इतनी बड़ी दाढ़ी है और ये कोई फरिश्ते लग रहे है माँ क्या मैं इनसे खाना मांगू इनके पास एक झोला है शायद इस झोले में ये कुछ रखते हैं

बच्चे की भूख मौलवी साहब को देखकर बढ़ती ही जा रहीं थीं और वो अपनी माँ का हाथ छुड़ा कर उनके पास पहुंच गया और उनकी आँखों मे देखने लगा लेकिन वो उनसे कुछ बोल नहीं पाया

लेकिन मौलवी साहब कुछ नहीं बोले लेकिन वे दूर से उस बच्चे को देख रहे थे कि बच्चा बार बार मस्जिद को देख कर अपना हाथ सीने मे रख लेता था

अब मौलवी साहब से नहीं रहा गया वे उसकी माँ के पास गए और उससे बोले कि तुम लोग कौन हो इसका बाप कहां है

माँ बोली कि मेरा बाप मुझे पैदा होते ही छोडकर चला गया और इसका बाप इसको पैदा करके चला गया मेरी माँ भी मुझे एक जगह छोडकर चली गई परंतु मैं अपने बच्चे को नहीं छोड़ेंगी मुझे माँ का फर्ज पूरे करने हैं अब ये बाद मे मुझे छोडकर जाए या ना जाए इसकी मर्जी

मौलवी साहब ने कहा कि एक बात कहूँ बुरा मत मानना तुम

उसकी माँ ने कहा ठीक है मैं तो मस्जिद के सामने बैठी हू जैसी अल्लाह की मर्जी मैं किस जाति की हू मुझे पता नहीं आप कहो अपनी बात

मौलवी साहब ने कहा कि मैं तुम्हें अपने घर मे नहीं रख सकता तुम मस्जिद के एक कमरे मे रह.सकती हो मस्जिद की सफाई का और इसकी देखरेख का काम मैं तुम्हें सौंप रहा हू शायद अल्लाह की यही मर्जी है और इतना सुनते ही उस महिला की आंख मे आंसू आ गए और उसने हामी भरी और मस्जिद मे रहने लगी

वो दोनों वहां सफाई करते और जो कुछ पैसा लोग उन्हें देते उसी मे दोनों खाना खाते

उन दोनों को देखकर नमाज अदा करने वाले लोग बहुत प्रभावित होते बच्चा 17 साल का हो गया दिन का पता ही ना चला वो एक स्कूल मे पढ़ाई भी करता था

एक दिन मौलवी साहब बहुत बीमार हो गए वे बूढ़े भी थे जब माँ बेटे दोनों को पता चला तो दोनों उनकी सेवा करने उनके घर पहुंच गए

मौलवी साहब ने कहा कि मेरी पूरी जिंदगी मस्जिद की सेवा मे गुजरी है अब शायद मेरा आखिरी समय आ गया है मुझे अब मस्जिद के एक कमरे मे छोड़ दो मैं वही मरना चाहता हू अब तो अज़ान भी नहीं होती मुझसे मैं अज़ान सुनकर मरना चाहता हूं

एक नेक काम किया था उन्होंने

दोनों माँ बेटे ने मौलवी साहब की सेवा की उनकी दुआ ली

मस्जिद के सामने जाते ही मौलवी साहब को नींद जैसी आने लगी मानो आज बरसों की थकान दूर हो गई थी

थोड़ी ही देर मे अज़ान शुरू हुई नमाज शुरू की जा रहीं थीं और मौलवी साहब के चेहरे पर मुस्कान थी

थोड़ी ही देर मे मौलवी साहब की आंखे खुली ही रह गई तब सबने समझ लिया कि मौलवी सहाब अब नहीं रहे

अब उनको कब्रिस्तान ले जाया जाने जाने लगा और उन्हें खाक ए सुपुर्द कर दिया गया उनकी मजार सामने थी

दोनों माँ बेटे उनकी मजार मे जाते थे और उनका शुक्रिया अदा करते थे

अब उनका मन मस्जिद मे नहीं लगता था लेकिन मौलवी साहब का आदेश था इसलिए उन्हें रुकना पड़ा जब तक बेटा अपने पैरों नहीं खड़ा हो जाता

टिप्पणी करे

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें