देव दासी भाग 531

हमारे भारतीय समाज की ये परम्परा अनोखी है कि सिर्फ लड़की ही पराई हो जाती है शादी के बाद जैसे कामिनी मुड़ मुड़ कर अपनी गलियों को देख रही थी

अभी भी वो बिदाई कामिनी को याद है वो बिदाई का गीत आज भी कभी कभी कामिनी अपने होठों पर गुनगुना लेती है

मेरी सुध अब ना लेना बाबुल मैं तो अब हो चली पराई

तेरी बगिया की एक नन्ही सी चिड़िया अब हो गई पराई

दाना चुग चुग बड़ी हुई मैं अब किसकी आस लगाऊँ मैं

दुनिया की तो रीति वही है घर अब पिया के जाऊँ मैं

और वो सुबक सुबक कर वही पर रोने लगती है उसे याद आ रहा है कि किस तरह वह अपने भैया से लिपट गई थी सारे भाई उसके पास खड़े होकर रो रहे थे उसके पिताजी अपने आंसू आँखों मे ही दबाए हुए खड़े हुए थे

माँ भी उसके पास आकर खड़ी हो गई थी भाभियों के भी आंसू नहीं रुक रहे थे कामिनी भाभी से कहती है भाभी मैंने तुम्हें बहुत सताया है अब ना सताएगी भाभी

भाभी ने कहा कि गुड़िया मेरी मैं तुम्हें अलग ना होने दूंगी मैं तुम्हें बुला लुंगी

और अब एक अवाज आई की विदाई का मुहूर्त निकलने वाला है और भैया वापस उसे गोद मे उठाकर डोली मे बिठा देते हैं

डोली मे खूब फूल, पैसे लुटाए जाते हैं। कामिनी को याद आता है कि उसकी माँ ने कहा था कि तुम्हें दो कुलों कि लाज रखनी होगी डोली मैके से इज्जत से उठे और अर्थी ससुराल से इज्जत से उठे यही हमारा धर्म है। क्रमशः

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