कुछ खामोशी सी है जैसे कि कुछ खो गया था परंतु अब कुछ पाने की चाह नहीं
राहें तो अभी भी बहुत है आती है और जाती है कुछ मुझसे टकराती है परंतु मैं करती हू अब मुझे किसी भी राह की चाह नहीं
गुबार भी अब नहीं उठता है सीने मे न ही कोई हलचल है मेरे दिल के टीले मे ना अब होशियारी से डर लगता है अब बचा ही क्या है जो मैं डरती रहूं कुछ खो जाने मे
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