
एक गाँव मे एक पुराना पेंड था जब पेंड हरा भरा था और जवाँ था और तब बच्चों का एक झुंड उसके पास खेलता था
शाम के समय पेंड के नीचे बहुत सारे लोग हंसते खिलखिलाहट से उस पेड़ को बड़ी खुशी मिलती थी
उस पेंड पर सावन मे झूले पड़ते बेटियाँ उस पेंड पर झुला झूल कर गाना गाया करती थीं
उस पेंड पर पके हुए फल होते और सब चिड़िया तोते उस पेंड पर आया करते थे
ना जाने कितने लोग जब मर जाते तो उनकी अर्थी उस पेंड के नीचे ही रखी जाती थी तब वह पेंड भी दुख होता कि उसके नीचे बैठने वाला एक इंसान चल बसा
धीरे धीरे लोग कम होते जा रहे थे
उस पेंड पर अब फल भी कम आने लगे थे
कितनी पंछी घोंसले बनाते थे लेकिन अब तो उनके बच्चे भी बड़े होकर उड़ गए थे नए नए पंछी घोसला बनाते थे
लेकिन ये क्या एक दिन बाढ़ आ गई और गाँव उस बाढ़ मे डूबने लगा
कितने लोगों को उसने बाढ़ मे बहते हुए देखा और मरते हुए देखा
आज वो समय था कि गाँव उजड़ गया वो चबूतरा भी बह गया जिसमें चौपाल लगती थी पंचायत बैठती थी
आज वो पेंड अकेला हो गया था सब गाँव छोड़ कर चले गए थे
मित्रों अपना जीवन भी ऐसा ही होता है
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