बेटियाँ और बेटे

लोग जब अपनी लड़कियों को लड़कों की तरह पालने लगते हैं तो ये बात जान लीजिये कि उन्हें गहरे में “लड़का” ही चाहिए था मगर गलती से उनके यहाँ लड़की पैदा हो गयी.. अब वो बाहर से मज़बूत दिखने के लिए, और ख़ुद को संतुष्ट करने के लिए कहने लगते हैं “मेरी बेटी तो सौ बेटों के बराबर है”.. क्यूँ? आपकी बेटी क्यूँ नहीं सिर्फ़ एक बेटी है? बेटा क्यूँ है वो?

कई लोग अपनी बेटियों को इस चक्कर में इतना भ्रमित कर देते हैं कि उनकी बेटियां ख़ुद को पुरुष वाचक शब्दों से संबोधित करने लगती है.. जैसे मैं खाऊंगा, मैं जाऊंगा पापा, मैं खेलूँगा.. ये बड़ी गंभीर स्थिति होती है उस बच्ची के लिए जिसे अभी समाज में आगे जाना है, नौकरी करनी है और ससुराल भी जाना है.. आप अपनी “ख्वाहिश” अपनी बेटी पर मत डालिए.. लड़के को तो एकबार आप अपनी बिटिया कह दें तो ठीक है क्यूंकि लड़का उसे कभी भी “लेटरल” नहीं लेगा.. वो एक कान से सुनेगा दूसरे से निकाल देगा.. मगर बेटियां संवेदनशील होती हैं.. उन्हें मत भ्रमित कीजिये

बेटियों को बेटी की तरह पालिए.. औरत होना बहुत ख़ूबसूरत है.. औरत के औरत होने में ही खूबसूरती है.. आप इसे स्वीकारिये.. अपनी बेटी को ये बताईये कि बेटी होना उतना ही अच्छा है जितना बेटा होना.. मैं करुँगी, मैं कहूंगी, मैं जाउंगी ऐसे सुंदर स्त्री वाचक शब्द हैं जिसे पुरुष नहीं बोल सकता है.. ये आपके लिए हैं और बहुत सुंदर हैं.. बेटियां पैदायशी हंस हैं, उन्हें वही रहने दो

“बेटियाँ और बेटे” को एक उत्तर

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