देव दासी भाग 537

जीवन की दहलीज पर जब वास्तविकता से सामना होता है तब समझ मे आता है कि जीवन क्या है

जब ठाकुर वीर सिंह की आंख खुलती है वे जाग जाते है तो देखते हैं कि कामिनी वहां नहीं थी वे कमरे मे कामिनी को खोजने लगते हैं तो देखते हैं कि कामिनी एक तरफ़ खिड़की के पास गुमसुम सी खड़ी हुई थी

ठाकुर वीर सिंह कहते हैं कि वहां क्या कर रहीं हो अभी तो कुछ नहीं हुआ इतने मे ही तुम डर गई हम ठाकुरों के साथ रहना असान बात नहीं है और हंसने लगते हैं

अब कामिनी को फिर से घसीटने लगते हैं लेकिन कामिनी उनका हाथ छुड़ा कर कमरे की ओर भागती है और हाथ मे एक तकिया उठा लेती है और उसी तकिये से ठाकुर वीर सिंह के ऊपर प्रहार करती है

ठाकुर वीर सिंह खूब जोर से हंसते हुए कहते हैं कि तुम तो अब और भी सुन्दर लग रहीं हो

कामिनी कहती हैं कि अब नहीं अब नहीं जाओ जाओ

लेकिन ठाकुर वीर सिंह हंसे जा रहे हैं तभी दरवाज़े पर अवाज होती है भाभी आओ बाहर आओ बहुत समय हो गया कब तक भीतर रहोगी

और ठाकुर वीर सिंह कामिनी का हाथ छोड़ देते हैं और एक तरह लेट जाते हैं चादर ओढ़ लेते हैं सोने का बहाना करते हैं

क्रमशः

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