देव दासी भाग 541

एक उमंग होती है एक तरंग होती है उसमे इंसान खो ही जाता है जैसे कि कामिनी खो गई वीर सिंह की बाहों मे खुद को भी भूल गई

सुबह हो चुकी थी रात बीत चुकी थी कामिनी अपने आपको संभाल कर उठी और नीचे की ओर झुकी तो देखा कि एक शराब की बोतल वहीँ पर रखी हुई थी

लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया वो आदि हो चुकी थी वो तो अपने घर मे भी देखती आई थी शराब की बोतल ,अपनी माँ और अपनी भाभी को अपने पति का इंतजार करते हुए

शायद यही जिंदगी है किसी ने ठीक ही कहा था कि एक ठाकुर की पत्नी के लिए ऐसे दिन बहुत कम.आते हैं ठाकुर वीर सिंह का तो रुतबा ही काफी ऊंचा था जैसा उनका रूप और कद उसी तरह उन्हें उनका रुतबा भी मिला था

अब कामिनी कमरे से जाने ही वाली थी वो बिल्कुल थकी थकी सी थी जैसे ही वो जाने वाली थी ठाकुर वीर सिंह ने फिर से कामिनी का कोमल हाथ पकड कर फिर से उसे खींच लिया

लेकिन कामिनी को अपने पति की इच्छा का ख्याल करना ही पड़ा अखिरकार वो थी तो ठाकुर वीर सिंह की धर्म पत्नी, कहीं ठाकुर वीर सिंह नाराज ना हो जाएं

लेकिन अब उसने वीर सिंह से कहा कि माँ गुस्सा होंगी अगर मैं बाहर ना निकली समय बहुत हो चुका है

अभी कुछ मेहमान रुके हुए हैं उनका ख्याल रखना होगा माँ ने जल्दी आने को कहा था अब आप मुझे जाने दो मंदिर भी जाना है

ठाकुर वीर सिंह ने कहा कि माँ ने कहा है तो तुम जाओ लेकिन मेरा भी ख्याल रखना

क्रमशः

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