देव दासी भाग 543

परंपरागत संस्कृति मे उलझी कामिनी अब एक सीमित दायरे मे पिस चुकी थी उसे एहसास हो चुका था कि वो अब इस उलझन मे अकेली नहीं है लेकिन वो और महिलाओं से सुखी और संपन्न है

उसकी अपनी जिंदगी ही अलग हो चुकी उसका कोई अस्तित्व अब नहीं बचा था अब तो उसका अस्तित्व ठाकुर वीर सिंह से जुड़ गया था वो अब वीर सिंह की पत्नी है उसका अपना एक रुतबा है

ठाकुर वीर सिंह की माँ भी एक बहुत बड़े घराने से ताल्लुक रखती हैं उनके भी पिता जमीनदार थे वे 5 बहनें है उनकी सारी बहनें भी अच्छे-अच्छे घरों मे ब्याही थीं

वो सब हमेशा हंसती ही रहती थी उनकी अंदरूनी जिंदगी के बारे मे कोई नहीं जानता शायद वे भी आदी हो चुकी थी

कामिनी भी अब धीरे धीरे आदी हो रहीं थीं वीर सिंह के साथ रहकर

वीर सिंह ने रात मे उससे कहा था कि तुम्हें जितने भी जेवर पैसे चाहिए मां से ले लेना मायके से कुछ मत लाना और ना ही किसी से कुछ मांगना ये ठाकुरों के ख़िलाफ़ है

ठाकुर किसी से कुछ मांगते नहीं और ना ही वे अपनी पत्नियों से कुछ मांगते हैं तो केवल उनका प्यार क्रमशः

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