देव दासी भाग 545

मतवाली सी चाल जिसकी थी जिसके होठों पर मुस्कराहट रहती थी आज वही कामिनी अपनी असली जिंदगी मे दो ही दिन मे परिपक्व हो चुकी थी

कामिनी के भैया आज लेने आने वाले थे कामिनी खुश थी और आज मंदिर मे भी थी

आज उसके गले मे कुलदेवी की माला डाली जा रहीं थीं और आज वो पूरी तरह से पहचान पाने वाली ठाकुरों की बहू बन चुकी थी

वो माला मूंगे की बहुत सुन्दर थी वो कामिनी के गले मे बहुत ही सुन्दर लग रहीं थीं

उधर वीर सिंह से गीता लड़ रहीं थीं और कह रहीं थीं कि भैया चलो पैसे निकालो अब

वर्ना भाभी को मैं जाने ना दूंगी आपके साथ

वीर सिंह अपनी जेब से पैसे निकालते है लेकिन गीता कहती हैं कि भैया कंजूसी ठीक नहीं और पैसे दो

कामिनी अपनी सोने की अंगुठी गीता को देने लगती है तो गीता कहती हैं नहीं भाभी तुमसे नहीं लुंगी भैया से लुंगी

और कामिनी को वह अंगुठी वापस कर देती है तभी ठाकुर वीर सिंह की माँ शांता कहती हैं कि तुम तो अभी से ही मालकिन कैसे बन गईं

रखो ये अंगुठी अपने पास अभी तो मैं देने के लिए बैठी हूं जब मैं ना रहूं तब तुम देना और कामिनी अपनी अंगुठी ले लेती है

क्रमशः

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