कामिनी के भैया आज लेने आने वाले थे कामिनी खुश थी और आज मंदिर मे भी थी
आज उसके गले मे कुलदेवी की माला डाली जा रहीं थीं और आज वो पूरी तरह से पहचान पाने वाली ठाकुरों की बहू बन चुकी थी
वो माला मूंगे की बहुत सुन्दर थी वो कामिनी के गले मे बहुत ही सुन्दर लग रहीं थीं
उधर वीर सिंह से गीता लड़ रहीं थीं और कह रहीं थीं कि भैया चलो पैसे निकालो अब
वर्ना भाभी को मैं जाने ना दूंगी आपके साथ
वीर सिंह अपनी जेब से पैसे निकालते है लेकिन गीता कहती हैं कि भैया कंजूसी ठीक नहीं और पैसे दो
कामिनी अपनी सोने की अंगुठी गीता को देने लगती है तो गीता कहती हैं नहीं भाभी तुमसे नहीं लुंगी भैया से लुंगी
और कामिनी को वह अंगुठी वापस कर देती है तभी ठाकुर वीर सिंह की माँ शांता कहती हैं कि तुम तो अभी से ही मालकिन कैसे बन गईं
रखो ये अंगुठी अपने पास अभी तो मैं देने के लिए बैठी हूं जब मैं ना रहूं तब तुम देना और कामिनी अपनी अंगुठी ले लेती है
क्रमशः

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