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मार्च 4, 2024
Chutny
anupama shukla
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देहाती लोग जब गीजर के पानी में; रुम हीटर के बीच; गन्ने का रस खरीद कर पीते हुए; जिन्दगी बिता रहे होते हैं तो कभी-कभी ठगा अनुभव करते हैं, आज गाँव आया हूँ, जैसे-जैसे गाड़ी गाँव की तरफ बढ़ रही थी लगता था और ठंड और भी परवान चढ़ रही है, शाम ढलने के साथ-साथ ठंड, धुन्ध और ठिठुरन और भी बढ़ती जा रही थी,घर पहुंच कर सबसे पहले आग जलाई, शहर में भी लकड़ी ला रखी है पर कभी उसे सुलगाने-जलाने की हिम्मत नहीं हुई,, रुम हिटर-ब्लोवर जो है.. बटन दबाते ही तपन शुरु हो जाती है.. पर मटर नहीं पक पाते.. आलू नहीं सिकते.. गाँव में आग के चारों तरफ कई संस्कृतियों का मिलन एक साथ होता सा है, तीन-चार पीढ़ीयाँ एक साथ बैठी हुई होती है, बच्चे-जवान, प्रौंढ़, बुढ़े सब एक घेरे में, आग में जब आलू पकते हैं तो छिक्कल के साथ आलू की एक परत भी साथ आती है.. क्या सोधापन होता है खाने में.. राख से निकलता आलू कोई धूल-धक्कड़ नहीं.. कोई हाइजीन की चिन्ता नहींआप एडवेंचर करने के लिए पैसे खर्च करते हैं.. सर्वाइवल लाइफ- बोले तो “यहीं है असली जिन्दगी” टाइप की लाईने पढ़ी होंगी आपने.. साल भर यदि आपने खुद से खेती कर ली और कम से कम एक दुधारू पशु पाल लिया तो सच कहूं आप परिपक्वता की श्रेणी में कई पद ऊपर पहुंच जायेंगे।गुड़ का महीया खाया है आपने.. शहरों में ये चीज नहीं मिलती, एमेजोन ने उपले बेचने कभी शुरु कर दिए पर महीया बिकने का प्रचलन देखिए कब शुरु होता है,, देखिए ‘गन्ने’ को पेर कर बनता है ‘रस’, रस को पका के गुड़ बनने से पहले का गाढ़ा पदार्थ होता है ‘महीया’, महीया जब बनना शुरु हो तो एक पतली सलाई में आलू धोकर गूंथ दो और उसे पक रहे गाढ़े गुड़ के रस में डाल दो.. आलू और महीया को कटोरी में रखकर देशी घी डाल के काट-काट के खाओ.. और पुअरा की सीक से उसे बोर-बोर के जीभ से चूसो.. ऐसा करने के बाद ‘आनन्द की परिभाषा’ से आप कन्फ्यूज हो जायेंगे.. ये महीया जैसे घी कनस्तर में रखते हैं वैसे ही इसे रखते हैं.. रोटी के साथ महीया में घी डाल कर खाने के मजे को आप भी पुनः एक बार याद करके इस अनोखेपन का आभास कर सकते हैंगाँव आते हुए गांड़ी रोक कर मटर खरीद ली, आलू लाने भूल गया तो वो भी गाँव से लिए और बन चुके कऊड़े में डाल कर पकाया तब तक पड़ोस से लाई मंगा ली, लाई को ढोंडा या ढूंन्डा भी बोलते हैं फोटो में देखिए चूड़े की लाई है, आग तापते हुए इसे खाया, आग में मटर पकाई, उसे खाया, मटर भी कह रही थी उसकी जिन्दगी सफल हो गई है, आलू को देशी धनिया की पिसी चटनी से खाया, वाह क्या स्वाद था..फुरसत वाली जिन्दगी होती है गाँव की.. कोई जल्दबाजी नहीं.. कोई हाय-हाय नहीं.. किस्से बहुत है.. अपवाद भी बहुत है… मन उमड़-घुमड़ रहा है….पहले गाँव में रहता था तो शहर दिखता है अब शहर से गाँव की तरफ नजरें टिकाए बैठे रहते हैं ये कागज की कस्ती वो बारिश का
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