
तभी अर्जुन चाय पीते हैं और मौसी आ जाती है अर्जुन को देखते ही वो कुछ परेशान हो जाती है और वो वही सारी बातेँ याद करने लगती है और कुछ नहीं कहती अर्जुन मौसी को जब प्रणाम करते हैं तो मौसी को कुछ समझ नहीं आता और वो सोचती हैं कि अर्जुन ने सभी लोगों के साथ कितना बुरा बर्ताव किया था
छोटी बच्ची की जान बची थी और वो किस तरह उन दोनों को लेकर वहां से आई थी
लेकिन मौसी कभी मेहमानों के साथ गलत बर्ताव नहीं करती और वह पूंछ लेती है कि कैसे आना हुआ
अर्जुन कहते हैं कि अपने परिवार को देखने आया हूं आप मुझे माफ़ करना मौसी
मैं अपने किए पर शर्मिंदा हू
मैं इन्हें ले जाने के लिए आया हूं घर मे इन दोनों के बिना अच्छा नहीं लगता है
मौसी कहती हैं कि मैं तो इन्हें नहीं भेज सकती हूं
नीलू तुम अंदर जाओ मैं इनसे बात करती हूं
मौसी ने कहा कि इस बच्ची की कितनी मुश्किल से जान बची है साफ़ साफ़ कह सकते हो कि इन्हें लेने क्यों आए हो तुम
तुमने तो इन्हें मरने के लिए छोड दिया था आज कौन सा रिश्ता बन आया
अर्जुन ने कहा मौसी मैं आपके पैर पड़ता हू इन्हें भेज दो
मौसी ने कहा नहीं अब मैं नीलू को नहीं भेज सकती मैं नीलू की दूसरी शादी कर दूंगी
वो लोग बेटी को भी रखने को तैयार हो गए हैं अभी इतनी कम उम्र की और इतनी सुशील हमारी बेटी है
रायपुर से इसके पापा नीलू को लेने आ रहे हैं उनकी चिट्ठी आई थी मौसी एक चिट्ठी दिखाती है जो नीलू के पापा ने लिखी थी अगले सप्ताह ही नीलू को लेने आ रहे हैं क्रमशः
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