
सुरुचि उसी मंदिर की तरफ बढ़ी चली जा रही थी जहां से घटों की ध्वनि सुनाई दे रहीं थीं सुरुचि सोंच रहीं थीं कि मंदिर में जाकर अपनी बेटी के लिए भगवान से प्रार्थना करेगी कि उसकी बेटी उसे जल्द वापस मिले
और वो देखती है और वह रुक जाती है कि उसकी जानी पहचानी जगह है
शायद वह यहा पहले आ चुकी थी लेकिन अब याद करने का समय नहीं मंदिर में पहुंचती है तो देखती है कि वो मंदिर बहुत ही भव्य था उसमे सोने का घंटा लगा था
ठाकुरों की कुलदेवी की भव्य प्रतिमा बनी हुई थी और देवी को देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे माता रानी सुरुचि के इंतजार मे थी क्रमशः
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