
वो मंदिर की ओर जा रही थी और देवी की मूर्ति को देखकर भावुक हो चली थी वहां पर कोई नहीं था उसके सिर का पल्लू गिर गया था उसके सिर के बाल उसके माथे पर छा गए थे वो माँ का ऐसा भव्य रूप देखकर आश्चर्य चकित हो चुकी थी उसे लगा कि माँ उसे देखकर खुश है
उसने माँ के कमंडल मे से थोड़ा सा जल अपने ऊपर छिड़का और माँ के चरण स्पर्श किए और माँ के आगे आंख बंद किए वो बैठ गई थी तभी वैध जी पुजारी जी को लेकर वहां पर आ रहे थे रोज मंदिर मे पूजा अर्चना होती थी शाम की आरती का समय था
अचानक सुरुचि की आंखे खुल गईं और उसने वैध जी और पुजारी जी को देख लिया और अपना गिरा हुआ पल्लू फिर से सिर पर रख लिया और एक कोने में खड़ी हो गई
क्रमशः
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