
जब मैं एक छोटी सी बच्ची थी
उछलते खेलते हुए जब नाचने लगती तो सारे लोग खुशी से हंस पड़ते थे
छीन कर खाने की चीजें खाना मेरा एक शौक बन चुका था
खाने की वस्तुएं दादी से नानी से और बाबा से छीन लेती
और गांव मे दादू का लोटा लेकर भागने लगती
पेंड मे चढ़ जाती
गाय, बछड़े कुत्तों को खोल देती थी वो सब भाग जाते थे
कितने तोते मैंने आज़ाद किए जो पिंजरों मे बंद थे
मैं रोटी में मक्खन लगा कर बाहर खटिया में बैठकर जब रोटी खाती तो एक कुत्ते का बच्चा भी आ जाता था उसे भी अपनी रोटी में से कुछ दे देती
एक कौवा मेरी रोटी छीनने की हिम्मत रोज करता था एक बार तो उसने मेरी उंगली मे काट भी लिया
लेकिन मेरी खटिया मे बैठकर ही खाने की आदत थी
एक दिन मैं उस खटिया मे बैठी थी कि मैं अपनी रोटी लेकर उस खटिया मे घुस गई क्योंकि वो खटिया ढीली थी और जब मैं घुसी तो मेरी हाथ की रोटी गिर गई और गुड का टुकड़ा भी हाथ से छूट गया वो दुष्ट कौवा मेरी रोटी लेकर भाग गया
मैंने उसे खूब गालियाँ दी और जोर से रोने लगी तभी मेरे एक चाचा नहा रहे थे उन्होंने मुझे खटिया से निकलकर एक चबूतरे पर बैठा दिया
अब मैं भूखी थी और रोटी लेने दादी के पास पहुंच गई
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